जब पाठ समझ में आया लगे, पर आप उसे समझा न पाएं: सीखने की असली कमी कैसे खोजें
पूरा विषय फिर से शुरू करने से पहले देखें कि कमी अर्थ में है, दो कदमों के बीच संबंध में है, या किसी नियम की सीमा समझने में।
यह लेख आपके लिए है, यदि
क्लास, वीडियो या काम का ट्यूटोरियल सामने हो तो आप उसे समझ लेते हैं, लेकिन बाद में यह साफ नहीं रहता कि वास्तव में कौन-सा हिस्सा समझ आया था।
पढ़ने के बाद आप
आप पहचान पाएंगे कि उलझन किसी शब्द के अर्थ, दो विचारों के बीच संबंध, या किसी नियम की सीमा में है, और फिर पूरे विषय को दोबारा शुरू करने की जगह एक छोटी समस्या पर काम कर पाएंगे।
स्क्रीन पर सब समझ में आया था। फिर अपने शब्दों में बताते समय वह कहाँ गायब हो गया?
हो सकता है आपने बस या मेट्रो में फोन पर पाठ देखा हो, या रात के खाने के बाद घर पर उसे फिर से खोला हो।
जब शिक्षक, वीडियो या नोट्स आपको आगे ले जा रहे थे, हर कदम ठीक लग रहा था। फिर स्क्रीन बंद करके आप वही बात खुद समझाने की कोशिश करते हैं।
कहीं एक शब्द खाली लगता है। कहीं दो कदमों के बीच कारण नहीं दिखता। या नियम उदाहरण में तो चलता है, लेकिन यह साफ नहीं कि वह कब नहीं चलेगा।
मन के अंदर ये तीनों समस्याएँ एक ही जैसी लग सकती हैं: “मुझे समझ नहीं आया।”
लेकिन ये अलग कमियाँ हैं, और आइए इन्हें एक-एक करके देखें।
आइए उलझन को छोटा और साफ करें
- आइए देखें कि कोई जरूरी शब्द अभी भी बिना साफ अर्थ के तो नहीं है।
- आइए देखें कि हमें समझ है या नहीं कि एक कदम से दूसरा कदम क्यों आता है।
- आइए देखें कि हमें पता है या नहीं कि किस स्थिति में नियम उसी तरह काम नहीं करता।
1. पहले देखें कि कोई जरूरी शब्द सिर्फ एक पहचान बनकर तो नहीं रह गया
कभी-कभी पूरा पाठ मुश्किल लगता है, जबकि असली दिक्कत एक ही शब्द में होती है।
वह शब्द आपको कोचिंग नोट्स, कॉलेज स्लाइड या ऑफिस ट्रेनिंग वीडियो में बार-बार दिख सकता है। लेकिन अगर आप उसका अर्थ उसी शब्द को दोहराए बिना नहीं बता सकते, तो समझ अभी अधूरी हो सकती है।
इसे हम अर्थ की कमी कह सकते हैं: शब्द पहचान में आता है, लेकिन उसके पीछे का विचार साफ नहीं है।
मनोवैज्ञानिक Leonid Rozenblit और Frank Keil ने इससे जुड़ी एक समस्या का अध्ययन किया, जिसे illusion of explanatory depth कहा जाता है। सरल भाषा में, इसका मतलब है कि हमें लग सकता है कि हम किसी चीज़ को जितनी गहराई से समझते हैं, वास्तव में उतनी गहराई से समझा नहीं पाते। उनके 2002 के शोध में रोज़मर्रा की परिचित प्रणालियों और उपकरणों की व्याख्या देखी गई थी, ऑनलाइन कोर्स नहीं। इसलिए यह शोध यह नहीं बताता कि हर सीखने की दिक्कत इसी वजह से होती है। लेकिन यह दिखाता है कि किसी विचार को खुद समझाने की कोशिश परिचित लगने और सच में समझ पाने के बीच का फर्क दिखा सकती है। (Rozenblit & Keil, 2002)
आप एक छोटा सवाल पूछ सकते हैं:
क्या मैं इस जरूरी शब्द को उसी शब्द का इस्तेमाल किए बिना समझा सकता हूँ?
मान लीजिए आप किसी क्लास, प्रवेश परीक्षा की तैयारी या ऑफिस की स्प्रेडशीट के लिए percentage change सीख रहे हैं।
आप फॉर्मूला चला लेते हैं, लेकिन “percentage change” का मतलब अभी भी बस इतना है: “फॉर्मूला जो जवाब देता है।”
अब इसे साधारण वाक्य में कहें:
Percentage change बताता है कि बदलाव, शुरुआती मान के मुकाबले कितना बड़ा है।
अब शब्द के पीछे एक साफ तस्वीर है। एक शुरुआती बिंदु है, फिर बदलाव है, और हम उस बदलाव को शुरुआती बिंदु से तुलना कर रहे हैं।
आपके नोट्स में अभी और काम हो सकता है, लेकिन पहली कमी अब छिपी नहीं है।
2. फिर देखें कि चीज़ें अलग-अलग समझ आती हैं, लेकिन उनके बीच की कड़ी गायब तो नहीं है
दूसरी तरह की दिक्कत तब आती है जब जरूरी शब्द समझ में आते हैं, लेकिन दो कदमों के बीच का तर्क गायब हो जाता है।
पहला विचार समझ आता है। दूसरा विचार भी समझ आता है। लेकिन पहला दूसरे तक क्यों ले जाता है, यह साफ नहीं है।
इसे हम संबंध की कमी कह सकते हैं।
Self-explanation पर हुए शोध से इस कमी को जांचने का एक अच्छा कारण मिलता है। Self-explanation का सीधा अर्थ है: सीखते समय सामग्री को खुद अपने शब्दों में समझाना। 1994 के एक अध्ययन में Michelene Chi और उनके साथियों ने आठवीं कक्षा के 14 विद्यार्थियों से circulatory system पर लिखे पाठ की हर पंक्ति पढ़ने के बाद उसे खुद समझाने को कहा। तुलना वाले समूह के 10 विद्यार्थियों ने वही पाठ दो बार पढ़ा, लेकिन उनसे ऐसा समझाने को नहीं कहा गया। जिन विद्यार्थियों से समझाने को कहा गया था, उनके pretest से posttest तक के नतीजों में बड़ा सुधार देखा गया। यह एक छोटे समूह और एक ही विषय का अध्ययन था, इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि self-explanation हर बार सीखने को बेहतर बनाता है। यह बस इस सीमित बात का समर्थन करता है कि अपने शब्दों में समझाना उन कड़ियों को दिखा या मजबूत कर सकता है जिन्हें सिर्फ पढ़ना कमजोर छोड़ दे। (Chi et al., 1994)
मान लीजिए आप किसी क्लास प्रोजेक्ट या ऑफिस के काम के लिए स्प्रेडशीट देख रहे हैं। कोई मान 80 से बढ़कर 100 हो गया।
आप जानते हैं कि बदलाव 20 है। यह भी जानते हैं कि सामान्य percentage-change calculation में 20 को 80 से भाग दिया जाता है।
अब पूछें:
80 ही क्यों?
अगर जवाब सिर्फ “क्योंकि फॉर्मूला ऐसा है” है, तो दिक्कत percentage change की परिभाषा में नहीं है। दिक्कत बदलाव की मात्रा और शुरुआती मान के बीच की कड़ी में है।
वह कड़ी है:
हम बदलाव के आकार की तुलना उस मान से कर रहे हैं जहाँ से शुरुआत हुई थी।
इसलिए 20 को 80 से भाग देने पर 0.25 आता है। बढ़ोतरी 25% है।
अब गणना एक साफ सवाल का जवाब देती है। 20 की बढ़ोतरी, शुरुआती 80 का एक चौथाई है।
पूरे percentages वाले पाठ को फिर से खोजने की जगह अब आपका सवाल छोटा हो सकता है:
यह कदम पिछले कदम से क्यों आता है?
3. आखिर में देखें कि नियम आता है, लेकिन उसकी सीमा पता है या नहीं
सही जवाब के पीछे भी एक और कमी छिपी हो सकती है।
शब्द समझ आते हैं और कदमों के बीच का संबंध भी साफ है। लेकिन हो सकता है आपने सिर्फ वही मामले देखे हों जहाँ नियम सामान्य तरीके से काम करता है।
आप अभी उसकी सीमा नहीं जानते। सीमा का मतलब है वह जगह जहाँ नियम उसी तरह काम नहीं करता।
उसी percentage-change वाले विचार को लें। इस बार सोचिए कि आप किसी रिपोर्ट, असाइनमेंट या अभ्यास प्रश्न में इस्तेमाल करने से पहले स्प्रेडशीट का फॉर्मूला जांच रहे हैं।
मान लीजिए कोई मान 0 से 20 हो जाता है।
बदलाव 20 है। लेकिन सामान्य percentage-change calculation बदलाव की तुलना शुरुआती मान से करता है, इसलिए यहाँ 20 को 0 से भाग देना पड़ेगा।
शून्य से भाग देना परिभाषित नहीं है। इसलिए जब शुरुआती मान 0 हो, तो सामान्य फॉर्मूला साधारण percentage change नहीं दे सकता।
पहले की समझ गलत नहीं थी। आपने बस एक ऐसी स्थिति खोज ली जहाँ नियम को अलग तरह से संभालना पड़ता है।
अब तीसरा सवाल मिलता है:
मैं इस उदाहरण में क्या बदलूँ कि नियम उसी तरह काम करना बंद कर दे?
हर संभव अपवाद खोजने की जरूरत नहीं है।
एक साफ सीमा भी यह दिखाने के लिए काफी है कि आप सिर्फ याद किया हुआ ढांचा नहीं दोहरा रहे, बल्कि नियम का आकार समझ रहे हैं।
“मुझे समझ नहीं आया” के पीछे तीन अलग कमियाँ हो सकती हैं
ये तीन जांच इसी क्रम में सबसे उपयोगी हैं, क्योंकि हर जांच अलग समस्या को पकड़ती है।
पहले अर्थ देखें। अगर कोई जरूरी शब्द अभी भी खाली है, तो आगे का तर्क मजबूत आधार पर नहीं टिकेगा।
फिर संबंध देखें। अगर शब्द साफ हैं लेकिन दो कदमों के बीच पुल गायब है, तो नई परिभाषा शायद मदद न करे। आपको यह समझाना होगा कि एक विचार दूसरे तक क्यों ले जाता है।
अंत में सीमा देखें। अगर अर्थ और संबंध दोनों साफ हैं, तो उदाहरण की एक शर्त बदलकर आप जांच सकते हैं कि आपको नियम समझ आया है या सिर्फ वही उदाहरण याद है जो दिखाया गया था।
यह हर तरह की learning problem की वैज्ञानिक सूची नहीं है। यह तीन सवालों की एक practical जांच है, और कभी-कभी एक साथ एक से ज्यादा कमी भी हो सकती है।
मकसद बस इतना है कि हर उलझन को एक बहुत बड़ी समस्या न माना जाए।
“मुझे समझ नहीं आया” पर काम करना मुश्किल है।
“कौन-सा शब्द साफ नहीं है?”
“कौन-सी कड़ी गायब है?”
“यह नियम कहाँ काम करना बंद करता है?”
इन सवालों पर आप वास्तव में काम कर सकते हैं।
उस व्यक्ति के थोड़ा और करीब जाएँ, जो आप बनना चाहते हैं
- आइए किसी क्लास, ट्यूटोरियल या काम के एक उलझे हुए विचार को चुनें और उसके सबसे जरूरी शब्द को साधारण भाषा में समझाएँ।
- आइए ऐसे दो कदम खोजें जिन्हें हम अलग-अलग समझते हैं, फिर पूछें कि उनके बीच की कड़ी क्या है।
- आइए किसी छोटे उदाहरण की एक शर्त बदलें और देखें कि नियम अभी भी उसी तरह काम करता है या नहीं।
आज ही सब कुछ समझ लेना साबित करना जरूरी नहीं है।
हम सिर्फ अगली छूटी हुई कड़ी को इतना साफ करना चाहते हैं कि उस पर काम किया जा सके।
छोटा सवाल अगला कदम बहुत ज्यादा साफ कर सकता है।
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