जब जवाब अब आपके हाथ में नहीं है: इंतज़ार के समय क्या करें

इंटरव्यू, संदेश, माफ़ी या आवेदन के बाद अपने हिस्से के काम को उस फैसले से अलग करें जो कोई दूसरा व्यक्ति करेगा।

भारत में एक व्यक्ति ज़रूरी संदेश भेजने के बाद फोन उल्टा रखकर नोटबुक की ओर हाथ बढ़ाता है।

यह लेख आपके लिए है, यदि

आप अपना ज़रूरी कदम उठा चुके हैं, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति का जवाब मायने रखता है, इसलिए आप बार-बार फोन देखते या वही बात मन में दोहराते रहते हैं।

पढ़ने के बाद आप

आप समझ पाएँगे कि अब भी क्या करना आपके हाथ में है, एक उपयोगी अगला कदम पूरा कर पाएँगे और बाद में मिले नतीजे को अपने पूरे प्रयास का फैसला मानने के बजाय जानकारी की तरह इस्तेमाल कर पाएँगे।

हमने अपना काम कर दिया है, फिर भी फोन बार-बार क्यों देख रहे हैं?

मान लीजिए आपने कॉलेज प्लेसमेंट का इंटरव्यू दिया है या दफ़्तर के बाद घर से वीडियो इंटरव्यू पूरा किया है। लैपटॉप बंद करते समय लगता है कि अब बस जवाब का इंतज़ार है।

थोड़ी देर बाद फोन चमकता है।

वह संदेश नहीं है जिसका आप इंतज़ार कर रहे थे।

आप फोन रख देते हैं, फिर कुछ मिनट बाद दोबारा देख लेते हैं।

जवाब मायने रखता है, इसलिए मन नया काम ढूँढने लगता है: क्या मेरा जवाब कमज़ोर था? क्या अभी एक और संदेश भेजूँ? क्या चुप्पी का मतलब ही “नहीं” है?

यहाँ एक फर्क मदद करता है। कोई स्थिति अभी खत्म न हुई हो, इसका मतलब यह नहीं कि उसमें आपका काम भी अभी बाकी है।

प्राचीन दार्शनिक एपिक्टेटस की एक छोटी रचना Enchiridion के Elizabeth Carter द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद का पहला खंड इस वाक्य से शुरू होता है:

“Some things are in our control and others not.”

उसी खंड में “whatever are our own actions” यानी हमारे अपने कामों को हमारे नियंत्रण वाली चीज़ों में रखा गया है, जबकि दूसरों की नज़र में हमारी छवि और हमारा पद उस समूह से बाहर रखे गए हैं। यह अंश MIT Internet Classics Archive में पढ़ा जा सकता है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए हम इस विचार को एक आसान सवाल में बदल सकते हैं:

इस स्थिति में अब भी कौन-सा काम मुझे करना है?

आइए इंतज़ार को थोड़ा साफ़ बनाते हैं

  • आइए अपने हिस्से को उस फैसले से अलग करें जो किसी और को करना है।
  • आइए ऐसा अगला कदम चुनें जिसका सचमुच अंत हो सके, ताकि पूरी शाम उसी इंतज़ार में न फँसे।
  • आइए अंतिम नतीजे से सीखें, लेकिन उससे अपनी पूरी योग्यता का फैसला न करें।

1. जहाँ आपका काम खत्म होता है, वहाँ एक साफ़ रेखा खींचें

मान लीजिए आपने कॉलेज कैंपस में भर्ती का इंटरव्यू दिया है।

आप स्वाभाविक रूप से चुने जाना चाहते हैं, लेकिन “मुझे ही चुनना चाहिए” वाली सोच में दो लोगों के हिस्से एक साथ मिल जाते हैं।

आपके हिस्से में तैयारी, सवालों का जवाब, माँगी गई जानकारी भेजना और अपनी कमज़ोर जगह को सुधारना आता है।

दूसरी तरफ़ इंटरव्यू लेने वालों का हिस्सा है: वे किससे और बात करते हैं, भूमिका में क्या ढूँढ रहे हैं, कब फैसला करते हैं और अंत में किसे चुनते हैं।

एपिक्टेटस का फर्क इसी जगह काम आता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बाहर का नतीजा बेकार है; अर्थ यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति का काम आप उसकी जगह पूरा नहीं कर सकते।

इंटरव्यू के बाद एक साधारण नियंत्रण रेखा बना सकते हैं:

अभी भी मेरे हाथ में

  • जिस दस्तावेज़ या जानकारी का वादा किया था, उसे भेजना।
  • वह सवाल लिख लेना जहाँ मेरा जवाब अटक गया।
  • अगली सही जगह के लिए उस जवाब को बेहतर तैयार करना।

मेरे हाथ में नहीं

  • भर्ती करने वाले का अंतिम फैसला।
  • और कौन उम्मीदवार प्रक्रिया में है।
  • जवाब किस समय आएगा।
  • बातचीत खत्म होने के बाद दूसरा व्यक्ति मेरे बारे में क्या सोचता है।

दूसरी सूची की बातें आपके लिए महत्वपूर्ण रह सकती हैं। बस उन्हें देर तक देखते रहने से उन पर आपका नियंत्रण नहीं बढ़ता।

सोचिए, लैपटॉप बंद है और ऊपर पंखा घूम रहा है। आप अगली बार के लिए एक काम की बात नोट करते हैं और फिर उस फैसले को वहीं छोड़ देते हैं जहाँ वह सच में है।

बाहर अभी कुछ नहीं बदला, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी की सीमा अब साफ़ दिखने लगी है।

2. ऐसा अगला कदम चुनें जो सच में पूरा हो सके

अब मान लीजिए इंतज़ार नौकरी से जुड़ा नहीं है।

परिवार के WhatsApp चैट में हुई कड़वी बात के बाद आपने माफ़ी माँगी है। संदेश पढ़ लिया गया है, लेकिन जवाब नहीं आया।

आप चाहते हैं कि सामने वाला आपको माफ़ कर दे। यह इच्छा सही है, लेकिन “उसे मुझे माफ़ करना ही होगा” ऐसा काम नहीं है जिसे आप अकेले पूरा कर सकें।

आप अपने हिस्से को साफ़ कर सकते हैं। माफ़ी में अपनी गलती सीधे कह सकते हैं, सिर्फ़ अपनी बेचैनी कम करने के लिए तुरंत दूसरा संदेश भेजने से बच सकते हैं, और जो व्यावहारिक बात सुधारी जा सकती है उसे सुधार सकते हैं।

उसके बाद सामने वाले को समय चाहिए हो सकता है।

यही तरीका किसी ग्राहक को भेजे प्रस्ताव, आवेदन या अनुरोध पर भी काम करता है:

नतीजा जिसकी मुझे उम्मीद है:
ग्राहक मेरा प्रस्ताव स्वीकार करे।

वह हिस्सा जो उसके फैसले पर है:
वह “हाँ” कहता है या नहीं।

वह हिस्सा जो मैं पूरा कर सकता हूँ:
प्रस्ताव को एक बार जाँचना, वादा की गई चीज़ भेजना और तय करना कि मैं जवाब कब दोबारा देखूँगा।

आखिरी पंक्ति एक अगला जाँच समय बनाती है। इसका मतलब बस इतना है कि आप ऐसा समय तय करते हैं जब नई जानकारी मिलने पर सच में कोई नया फैसला लेना पड़ सकता है।

उससे पहले हर कुछ मिनट में ईमेल या चैट खोलना अतिरिक्त प्रगति नहीं बनाता।

आप फोन अलग रखकर खाना खा सकते हैं, घर लौट सकते हैं या अगला काम शुरू कर सकते हैं। इसका मतलब जवाब को हल्का समझना नहीं है; इसका मतलब इंतज़ार को सीमा देना है।

3. जवाब आने पर नतीजे और अपने काम की गुणवत्ता को अलग देखें

कुछ दिन बाद जवाब आ जाता है।

हो सकता है कॉलेज का आवेदन स्वीकार न हो, भर्ती करने वाला किसी और को चुने या ग्राहक आगे न बढ़ने का फैसला करे।

अब दो अलग सवाल मदद करते हैं: क्या हुआ? और इस नतीजे से मेरे हिस्से के काम के बारे में क्या सीख मिलती है?

इन दोनों सवालों का जवाब हमेशा एक जैसा नहीं होगा।

ग्राहक किसी साफ़ और अच्छी तरह जाँचे गए प्रस्ताव को भी ठुकरा सकता है। दूसरी ओर, कोई जल्दी में बनाया प्रस्ताव स्वीकार भी हो सकता है।

इसलिए नतीजा महत्वपूर्ण है, लेकिन वह आपके काम की गुणवत्ता का बिल्कुल सही पैमाना नहीं है। वह यह भी नहीं बताता कि नतीजा क्यों आया, जब तक जवाब में सच में कोई कारण या संकेत न दिया गया हो।

इसलिए नतीजे से उतनी ही जानकारी लें जितनी वह सच में देता है। अगर कई इंटरव्यू में वही कौशल बार-बार कमज़ोर निकलता है, तो उस पैटर्न पर काम करना समझदारी है; अगर कई लोग प्रस्ताव की वही पंक्ति गलत समझते हैं, तो शब्द बदलने की जरूरत हो सकती है।

अब उस संदेश की कल्पना करें जिसका कई दिन से इंतज़ार था और उसमें “नहीं” लिखा है।

निराशा तुरंत आ सकती है, लेकिन नियंत्रण रेखा आपको वापस एक साफ़ जगह देती है। क्या इस जवाब में ऐसी नई जानकारी है जिससे आपका अगला काम बदलता है, या आज इस स्थिति में सचमुच कुछ और हल करने को नहीं है?

अगर सीखने लायक बात है, तो हम उसे अगली कोशिश तक ले जा सकते हैं। अगर नहीं है, तो सिर्फ़ व्यस्त महसूस करने के लिए निराशा को नया काम बनाने की जरूरत नहीं है।

पहले सीमा साफ़ करें, फिर अपना काम पूरा करें, फिर नतीजे से सीखें

ये तीनों हिस्से इसी क्रम में काम करते हैं क्योंकि हर हिस्सा अलग समस्या हल करता है।

नियंत्रण रेखा बताती है कि आपकी ज़िम्मेदारी कहाँ तक है। पूरा हो सकने वाला अगला कदम इंतज़ार को पूरे दिन पर कब्ज़ा करने से रोकता है। बाद में आया नतीजा आपको अगली कोशिश के लिए उपयोगी जानकारी दे सकता है।

पहला कदम छोड़ देंगे तो शायद काम पूरा होने के बाद भी संदेश भेजते रहेंगे। दूसरा छोड़ देंगे तो सीमा समझकर भी शाम भर उसी बात को घुमाते रह सकते हैं; तीसरे को नज़रअंदाज़ करेंगे तो असली प्रतिक्रिया से मिलने वाली सीख छूट सकती है।

मकसद जवाब की परवाह करना बंद करना नहीं है। मकसद यह है कि आप जवाब की परवाह करें, लेकिन उस फैसले की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर न लें जो किसी और के हाथ में भी है।

उस व्यक्ति के थोड़ा और करीब आएँ जो आप बनना चाहते हैं

  • आइए जिस एक जवाब का हम इंतज़ार कर रहे हैं, उसकी बातों को अभी भी मेरे हाथ में / मेरे हाथ में नहीं की दो तरफ़ रखें।
  • आइए पहली तरफ़ से एक ऐसा उपयोगी कदम चुनें जिसे आज सच में पूरा किया जा सके।
  • आइए तय करें कि नई जानकारी देखने का अगला समय कब होगा, और बीच का समय अपनी बाकी ज़िंदगी को वापस दे दें।